प्रभु प्रेम भाव को देखते हैं और अगर प्रभु के लिए लिया नियम कभी टूट भी जाता है तो प्रभु उसकी पूर्ति स्वयं करते हैं । हमारा नियम अगर एक दिन के लिए किसी कारणवश टूट भी जाए पर अगर भाव खंडित नहीं हुआ तो प्रभु उस भाव को स्वीकारते हैं । एक सेठजी का नियम था कि रोज शाम को मंदिर जाकर प्रभु को दो लड्डू भोग लगाकर अर्पित करना । नियम का उन्होंने जीवनभर निर्वाह किया और कभी खंडित नहीं होने दिया । एक बार व्यापार के लिए बाहर गए हुए थे और शाम को बड़ी तेज वर्षा के कारण पानी भरने के कारण अपने गांव नहीं लौट पाए । शाम को प्रभु के लिए लड्डू लेकर मंदिर जाना था वह नियम आज टूटने वाला था । उनके मन में बहुत वेदना हुई और उन्होंने मन-ही-मन लड्डू प्रभु को अर्पण किया । वे जब गांव पहुँचे और दूसरे दिन सुबह मंदिर क्षमा मांगने गए तो मिठाई की दुकान वाले ने उन्हें आवाज देकर बुलाया । उस दुकानदार ने कहा कि आप कल शाम के दो लड्डू के पैसे बाकी छोड़कर गए हैं । सेठजी को समझते देर न लगी कि प्रभु ने स्वयं आकर लड्डू लेकर भोग लगा लिया और उनके नियम को टूटने नहीं दिया ।
हमारा दुर्भाग्य होता है कि हम अधिकतर लोगों की तरह कलियुग में प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य, जो कि हीरा तुल्य है, उसे छोड़कर संसार के विषयों और भोगविलास में लिप्त रहते हैं । इस तरह हम अपने मानव जीवन के उद्देश्य से चूक जाते हैं । एक संत थे जिनके पास एक महिला गई जो कि बड़ी भजनानंदी थी । महिला ने संत से कहा कि मेरे पति बिल्कुल नास्तिक हैं , उनका उद्धार कैसे होगा ? संत ने युक्ति से काम लिया और कहा कि शाम को भिक्षा के लिए मैं तुम्हारे घर आऊँगा और प्रभु कृपा करेंगे तो तुम्हारे पति का मन परिवर्तित हो जाएगा । शाम को संत उस महिला के घर पहुँचे और उसके नास्तिक पति को देखते ही दंडवत प्रणाम किया । पति भौचक्का रह गया कि संत ने क्यों प्रणाम किया ? पूछा तो संत बोले कि तुम बड़े त्यागी हो इसलिए मैंने तुमको प्रणाम किया है । अपनी बात को समझाते हुए संत बोले कि मैंने तो सांसारिक भोग विलास, जो कांच तुल्य है उसका त्याग करके भगवत् प्राप्ति, जो हीरा तुल्य है उसके लिए श्रम किया है । कांच को त्यागकर ही रे को सभी पाना चाहते हैं । संत ने आगे उस नास्तिक व्यक्ति से कहा कि तुमने तो हीरा छोड़कर कांच को पाया यानी प्...