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Showing posts from 2024

70. प्रभु और माता

जब हम प्रभु के साथ माता का भक्ति से आह्वान करते हैं तो दोनों हम पर अनुग्रह करने पधारते हैं पर केवल माता को धन की लालसा से बुलाने पर वे स्थाई रूप से नहीं रुकती । एक संत विनोद में एक कथा सुनाते थे । एक बार प्रभु श्री नारायणजी को भगवती लक्ष्मी माता ने विनोद में कहा कि कलियुग में लोग केवल मेरी ही कामना करते हैं । प्रभु ने कहा कि मेरी कामना करने वाले भी कुछ बिरले भक्त हैं । ऐसे ही एक भक्त की परीक्षा लेने प्रभु और माता पृथ्वी पर आए । प्रभु एक संत का रूप धारण कर अपने भक्त एक सेठजी के घर पहुँचे । सेठजी ने बड़ा स्वागत सत्कार किया और रात को रुकने का आग्रह किया । तभी माता एक बुढ़िया का रूप धारण करके सेठजी के घर पहुँची । सेठजी ने उनका भी सत्कार किया और दोनों को भोजन परोसा । माता ने अपनी झोली से स्वर्ण की थाली, गिलास और कटोरी निकाल कर कहा कि भोजन वे इ समें ही करती हैं और भोजन के बाद दोबारा उन स्वर्ण के बर्तनों का इस्तेमाल नहीं करती और उसे भोजन करवाने करने वाले को दान दे देती है । उनके पास सिद्धि है और अगले भोजन के समय फिर उनकी झोली में स्वर्ण की थाली, गिलास और कटोरी प्रकट हो जाती है । माता ने कहा...

69. प्रभु द्वारा भक्तों को मान

प्रभु अपने से भी ज्यादा मान अपने भक्तों को देते हैं । प्रभु अपने प्रिय भक्तों को जगत से भी बहुत मान दिलाते हैं । जब प्रभु के भक्तों को मान मिलता है तो सबसे ज्यादा प्रसन्नता प्रभु को ही होती है । श्री रामायणजी का एक प्रसंग है । जब प्रभु श्री रामजी वनवास के लिए वन में गए तो उन्‍होंने सभी ऋषियों और मुनियों के आश्रम जाकर उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया । इसी श्रृंखला में प्रभु मुनि श्री भारद्वाजजी के आश्रम गए । जब प्रभु को मनाने के लिए श्री भरतलालजी वन में गए तो वे भी मुनि श्री भारद्वाजजी के आश्रम पर रुके । मुनि श्री भारद्वाजजी ने जो सबके सामने श्री भरतलालजी को कहा वह भक्त की महिमा बताने वाला उल्लेख था । उन्होंने कहा कि मेरे अभी तक के पुण्य, तपस्या और उपासना का फल था कि प्रभु श्री सीतारामजी मुझे दर्शन देने पधारे । पर प्रभु सीतारामजी के दर्शन का फल है जो एक परम भागवत् भक्त श्री भरतलालजी के दर्शन का सौभाग्य उन्हें आज प्राप्त हो रहा है । यह कितना बड़ा मान एक भक्त के लिए है कि प्रभु की अनुकंपा का फल होता है कि एक भक्त का दर्शन हमें जीवन में मिले । यह कितना बड़ा सच है कि प्रभु अपने से भी कितना ...

68. प्रभु का भरोसा

हम अपने बल, बुद्धि और पुरुषार्थ पर भरोसा करते हैं जबकि अगर हमें जीतना है तो प्रभु पर भरोसा करना चाहिए । हमें अपने बल, बुद्धि और पुरुषार्थ को भूलना पड़ता है तब जाकर प्रभु पर सच्चा भरोसा कर पाएंगे । श्री महाभारतजी का प्रसंग है । दुर्योधन के उकसाने पर श्री भीष्म पितामह ने प्रतिज्ञा कर ली कि कल के युद्ध में एक पांडव को मारूंगा । प्रभु को पता था कि इसका अर्थ है श्री अर्जुनजी क्योंकि और कोई पांडव तो उनके सामने टिक ही नहीं सकते । उस रात श्री अर्जुनजी निश्चित होकर खर्राटे लेकर सो गए । प्रभु शिविर में चक्कर लगाकर सोचने लगे कि दोनों तरफ परम भागवत् और भक्त हैं । एक का प्राण टूटेगा या दूसरे की जान जाएगी । प्रभु असमंजस में थे कि किसका पक्ष लूं । तब प्रभु ने युक्ति करते हुए श्री अर्जुनजी को नींद से उठाया और पूछा कि तुम चिंतित नहीं हो भीष्म प्रतिज्ञा सुनकर । श्री अर्जुनजी ने नींद से आँखें खोली और कहा कि केशव, आप मेरी चिंता कर रहे हो ना इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं है और मुझे निश्चिंत होकर सोने दो । प्रभु को अपना जवाब मिल गया कि किसका पक्ष लिया जाए । श्री भीष्म पितामह ने अपने बल पर प्रतिज्ञा की थी ...

67. भक्ति के कारण भक्त का प्रभाव

भक्ति के कारण भक्तों और संतों का प्रभाव इतना बड़ा होता है जो सचमुच अद्वितीय है । प्रभु अपने प्रिय भक्तों और संतों के प्रभाव को जग जाहिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते । एक प्रसंग से भक्ति के कारण भक्तों और संतों की महिमा का हमें पता चलता है । जब भगवती गंगा माता को पृथ्वीलोक में अवतरण के लिए श्री भागीरथजी ने तपस्या करके राजी किया तो माता ने एक प्रश्न पूछा । माता ने पूछा कि प्रभु के श्रीकमलचरणों से निकलने के कारण उनमें पापनाशिनी शक्ति है । पर जब साधारण लोगों के स्नान करने पर वे उनके पाप हरेंगी तो अंत में उनके यहाँ लोगों का जमा हुए संचित पापों का क्षय कैसे होगा । तो श्री भागीरथजी ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया कि जब कोई प्रभु के भक्त और संत भगवती गंगा माता में स्नान करेंगे तो वे उन संचित पापों को भस्म कर उनका क्षय कर देंगे । इस तरह भगवती गंगा माता में कोई पाप टिक ही नहीं पाएंगे । साधारण लोगों के स्नान करने से भगवती गंगा माता में पाप जमा होंगे और भ क्तों के स्नान करने पर वह जमा पाप का क्षय   हो जाएगा । इससे भक्ति और भक्त की महिमा का पता चलता है ।

66. आस्तिक और नास्तिक

सत्कर्म, पूजा, सत्संग और भजन कभी व्यर्थ नहीं जाते । वे हमारे पूर्व के संचित पाप काटते हैं और वर्तमान जीवन में हमारा कल्याण और उद्धार कराते हैं । एक संत एक कथा सुनाते थे । दो दोस्त थे । एक बहुत अमीर पर नशा, जुआ, व्यभिचार   और गलत आचरण करने वाला नास्तिक था । दूसरा बहुत गरीब था पर पूजा-पाठ, भजन और सत्संग और श्रीग्रंथों का स्वाध्याय करने वाला आस्तिक था । दोनों एक बार जंगल के रास्ते किसी दूसरे गांव कोई मेला देखने जा रहे थे । गरीब दोस्त को रास्ते में ठोकर लगी और पैर में से रक्त बहने लगा । उससे आगे चल रहे अमीर दोस्त को भी ठोकर लगी पर उसे कुछ नहीं हुआ और उसे लगा कि कुछ जमीन में दबा हुआ है जिसके कारण ठोकर लगी है । उसने खोद कर देखा तो एक स्वर्ण कलश में सोने की मोहरे मिली । वह खुशी-खुशी अपने दोस्त गरीब दोस्त का मजाक उड़ाने आया कि ठोकर दोनों को लगी पर  तुम्हें  खून निकल गया और मुझे बेइंतहा धन मिला । तभी आकाशवाणी हुई कि जि से खून आया है उसकी आज मौत लिखी थी पर सत्संग और भजन के प्रभाव से छोटी-सी चोट में प्रभु ने उसे टाल दिया । और जिसे स्वर्ण मुद्राएं मिली है उसके भाग्य में आज एक राजा...

65. तिलक का महत्व

पहले के लोग तिलक, माला, चोटी रखते थे पर आज पश्चिमी संस्कृति का बोलबाला होने पर यह लुप्तप्राय हो गया है । तिलक को मस्तक पर लगाने का कितना बड़ा महत्व है यह एक प्रसंग से समझने में आता है ।   एक व्यक्ति ने एक दुकानदार से तिलक की डिबिया की एक्सपायरी डेट (समाप्ति तिथि) पू छी । वहीं पास में एक संत बैठे थे वे उठकर आए और एक बड़ा मार्मिक उत्तर उस व्यक्ति को दिया । संत बोले कि तिलक की डिबिया की कोई एक्सपायरी डेट नहीं है पर यह प्रभु की प्रसादी जिनके मस्तक पर तिलक के रूप में लगती है उस मस्तक की एक्सपायरी डेट बढ़ा देती है । इसलिए पहले के वैष्णव सदा घर से निकलने से पूर्व प्रभु का प्रसादी तिलक अपने मस्तक पर धारण करके निकलते थे । जैसे एक पतिव्रता स्त्री की पहचान उसके सिंदूर से होती है कि वह शादीशुदा है ऐसे ही प्रभु के आश्रित एक भक्त की पहचान उसके मस्तक पर प्रभु का प्रसादी तिलक लगाने से होती है ।

64. हमने संसार को पकड़ा

उम्र आने पर भी हम संसार में उलझे रहते हैं और मानव जीवन के उद्देश्य भगवत् प्राप्ति की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता । जब कोई हमें आगाह करता है तो हमारा एक ही उत्तर होता है कि क्या करूं संसार के कामों में इतना व्यस्त हूँ कि प्रभु के लिए समय ही नहीं निकल पाता । एक सेठजी एक संत के शिष्य थे । संत उन्हें बार-बार कहते थे कि अब आपके बेटे काम संभाल चुके हैं और आपकी आयु भी अधिक हो गई है तो अब आपको संसार की दुनियादारी छोड़कर भगवत् प्राप्ति के उद्देश्य से प्रभु की भक्ति करनी चाहिए । जितनी बार भी संत ऐसा सेठजी को समझाते सेठजी एक ही बात कहते थे कि चाहता तो मैं भी हूँ पर संसार मुझे छोड़ता ही नहीं । एक बार संत उनके घर पर एक रात रूके । सुबह जब प्रस्थान का समय आया तो संत एक खंभे को प क ड़कर चिपक गए और कहने लगे कि खंभे ने मुझे पकड़ लिया । सेठजी तुरंत बोल पड़े कि गुरुजी आप खंभे को छोड़ दें तो खं भा भी आपको छोड़ देगा । संत बोले कि यही मैं तुमको बताना चाहता हूँ कि तुम संसार में मत उलझो, संसार को छोड़ दो तो संसार भी तत्काल तुम्हें छोड़ देगा । संत ने आगे कहा कि संसार ने तुमको नहीं पकड़ा   है अपितु जैस...

63. उल्टी रेखाएं

चाहे कोई धनवान हो या गरीब सबको सातों सुख नहीं मिलते । सबके मस्तक पर उल्टी लकीर यानी रेखाएं होती ही हैं । किसी को पुत्र का सुख नहीं, किसी को धन की कमी है, किसी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, किसी को अन्य कोई अशांति रहती है । एक संत एक कथा सुनाते थे । वे कहते थे कि रबर स्टांप   में शब्द और अंक उल्टे होते हैं पर जब वह स्याही में लगाकर कागज पर लगाए जाते हैं तो कागज पर सुलटे हो जाते हैं । वैसे ही जब हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकता है और वहाँ की श्रीरज हमारे मस्तक पर लगकर फिर संसार पटल पर हमारा मस्तक लगता है तो ही वह सुलटा पड़ता है । नहीं तो उल्टी रेखाएं यानी धनहीनता, बीमारी, शोक, रोग, बिगड़े रिश्ते, बच्चों द्वारा परेशानी, व्यापार-नौकरी की दिक्कतें, अन्य अशांति इत्यादि हमें जीवन भर परेशान करके रखती हैं । पर जब साष्टांग दंडवत प्रणाम में हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकता है तो हमारी उल्टी रेखाएं सुलटी हो जाती हैं । प्रभु को किया एक प्रणाम जीवन के कितने बड़े परिणाम को बदलने की क्षमता रखता है ।

62. प्रभु के श्रीकमलचरण

हम संसार में शांति और आनंद खोजते हैं पर हमें नहीं मिलती क्योंकि जो चीज जहाँ पर नहीं होगी वह वहाँ से कैसे मिलेगी ? जो सामान एक कमरे में नहीं है उसे कितना भी आप खोजिए वह वहाँ पर कभी नहीं मिलेगा । एक संत एक कथा सुनाते थे । जब प्रभु ने सृष्टि ब ना ई तो प्रभु श्री नारायणजी के आदेश से उनके श्रीकमलचरणों से निकलकर ऐश्वर्य, श्री, कीर्ति इत्यादि सभी पृथ्वीलोक में चले गए । भगवती लक्ष्मी माता प्रभु के श्रीकमलचरणों की सेवा कर रही थीं । उन्होंने ध्यान लगाकर देखा कि कुछ तो प्रभु के श्रीकमलचरणों में चिपका रह गया जो पृथ्वीलोक में नहीं गया । ध्यान लगाकर देखने पर ज्ञात हुआ कि शांति और आनंद पृथ्वीलोक में नहीं गए और प्रभु के श्रीकमलचरणों में ही चिपके रह गए । हम शांति और आनंद संसार में खोजते हैं पर वह तो हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकने पर ही हमें मिल सक ते  हैं । इसलिए हमें गलत जगह पर यानी संसार में शांति और आनंद को खोजने का प्रयास नहीं करना चाहिए । हमें अपना मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकना चाहिए तो ही हमें प्रसाद रूप में प्रभु से शांति और आनंद की प्राप्ति हो पाएगी ।

61. शरणागति का महत्व

प्रभु की शरणागति का बहुत बड़ा महत्व है । प्रभु की शरण में आने पर कोई विपत्ति हमें परेशान नहीं कर सकती । प्रभु उन सबको शरण देते हैं जो उनकी शरणागति स्वीकार करना चाहते हैं । प्रभु की श्रीमद् भगवद् गीताजी के अठारहवें अध्याय में घोषणा है कि प्रभु की शरण में आने पर प्रभु हमें सभी पापों से मुक्त कर देंगे । दूसरा आश्वासन प्रभु का है कि “चिंता मत करो” क्योंकि प्रभु हमारे संरक्षण के लिए तैयार खड़े हैं । ये दोनों कित ने ब ड़े आश्वासन हैं कि सभी जन्मों-जन्मों के संचित पापों से मुक्त कर देना और सभी चिं ताओं का हरण कर लेना । संत कहते हैं कि दुराचारी-से-दुराचारी भी अगर प्रभु की शरण में आता है और सच्चा पश्चाताप करता है और अपने द्वारा की गई गलती या पाप को जीवन में नहीं दोहराने का संकल्प करता है तो प्रभु तत्काल उसे चिंताओं से निश्चिंत कर पाप मुक्त कर देते हैं और उसका उद्धार कर देते हैं । यह प्रभु की कितनी विलक्षण करुणा, कृपा और दया है ।

60. योगक्षेम का महत्व

प्रभु द्वारा श्रीमद् भगवद् गीताजी में भक्तों का योगक्षेम वहन करने का प्रण लिया हुआ है । यह एक अदभुत प्रण है जिसके अलावा हमें प्रभु से कुछ अन्य चाहने की जरूरत ही नहीं होती । प्रभु के इस एक प्रण में सब कुछ समाहित है । योगक्षेम संस्कृत का शब्द है और दो शब्दों से बना है । पहला शब्द है “योग” जिसका अर्थ है कि अप्राप्त की प्राप्ति करना । यानी प्रभु वचन देते हैं कि जो भक्त उ न की शरण में है उसे जब भी, जिस भी चीज की आवश्यकता पड़ेगी प्रभु उसे उपलब्ध कराएंगे । आज से दस वर्ष बाद भी जिस चीज की आवश्यकता है वह हमें आज परिश्रम के बाद भी शायद नहीं मिले पर निर्धारित समय पर प्रभु अवश्य उसे प्रदान करेंगे । दूसरा शब्द “क्षेम” है जिसका अर्थ है कि जो हमें प्राप्त है प्रभु कृपा करके उसकी रक्षा और संरक्षण करेंगे । यह कितना बड़ा आश्वासन है नहीं तो प्रारब्ध राजा को रं क बना देता है । प्रभु के इन दो आश्वासनों के अलावा देखा जाए तो एक भक्त को और कुछ भी नहीं चाहिए । सभी बातें पूर्ण रूप से इन दो आश्वासनों में आ गई । जो अप्राप्त है उसे प्रभु प्राप्त करा देंगे और जो प्राप्त है उसकी प्रभु रक्षा करेंगे । जरूरत है तो ...

59. भक्ति की व्याख्या

भक्ति शब्द का प्रयोग सनातन धर्म के हर शास्त्र और श्रीग्रंथ में बड़ी श्रद्धा के साथ किया गया है । पर भक्ति किसे कहते हैं, सबसे सरल भाषा में हम भक्ति को समझने का प्रयास करते हैं । वैसे तो भक्ति की बहुत बड़ी व्याख्याएं हैं । पर जो सबसे समझने योग्य और सरल है वह यह है कि सबसे सरलतम भाषा में समझे तो प्रभु से पूर्ण रूप से प्रेम करना ही भक्ति है । हम सभी प्रेम करना जानते हैं । कोई सांसारिक रिश्तों से प्रेम करता है, कोई धन से प्रेम करता है, कोई अन्य सांसारिक पदार्थों से प्रेम करता है । हमें बस उस प्रेम की दिशा को मोड़कर और बदलकर प्रभु की तरफ कर देना है यानी प्रभु से प्रेम करना ही भक्ति है । देखिए कितना सरल है भक्ति करना । प्रभु हमसे सिर्फ प्रेम चाहते हैं । प्रभु से पूर्ण प्रेम करने लग जाए तो प्रभु तत्काल संतुष्ट हो जाते हैं और हमारी भक्ति सिद्ध हो जाती है । पर दुर्भाग्यवश इतना सरल होने पर भी हम ऐसा नहीं कर पाते । हमें केवल और केवल प्रेम की दिशा को बदलना है, अन्य कुछ भी नहीं करना क्योंकि प्रेम करना सभी जी वों को आता है । बस वह प्रेम प्रभु से हो जाए तो हम भक्ति में सफल हो जाते हैं ।

58. सुख और दुःख

सुख और दुःख सबके जीवन में आते हैं । सभी को जीवन में किसी-न-किसी समय सुख या दुःख का सामना करना पड़ता है । संतों और भक्तों ने सुख से ज्यादा दुःख की महिमा बताई है । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक बार अचानक एक मोड़ पर सुख और दुःख की मुलाकात हो गई । दुःख ने सुख से कहा कि तुम कितने भाग्यशाली हो कि संसार के लोग तुम्हें प्राप्त करने की कोशिश में जीवन भर लगे रहते हैं । सुख असली बात जानता था और उसने बड़े विनम्र होकर दुःख को बड़ा मार्मिक उत्तर दिया । सुख ने मुस्कुराते हुए दुःख से कहा कि भाग्यशाली मैं नहीं तुम हो । दुःख ने हैरानी से पूछा कैसे ? तो सुख ने ब ड़ी ईमानदारी से सच्चा जवाब दिया । सुख ने कहा कि मुझे पाकर सभी लोग प्रभु को भूल जाते हैं और मेरा उपभोग करने में ही जीवन और यहाँ तक कि बुढ़ापा भी बिता देते हैं । पर इसके ठीक विपरीत तुम्हें पाकर लोग तुरंत प्रभु को याद करते हैं और प्रभु की शरण में चले जाते हैं । तो जो प्रभु को बिसरा दे वह बड़ा या जो प्रभु से मिला दे वह बड़ा । इसलिए ही संतों और भक्तों ने जीवन में दुःख का सहर्ष स्वीकार किया और प्रभु प्राप्ति में सहयोग के लिए दुःख को धन्यवाद दिया है ।

57. प्रभु का साम्राज्य

प्रभु एक नहीं बल्कि कोटि-कोटि ब्रह्मांडों के मालिक और निर्माता हैं । हम थोड़ी-सी जमीन-जायदाद रूपी संपत्ति पाकर गर्व करने लगते हैं और उसका अहंकार कर लेते हैं जो बिलकुल गलत है । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक राजा था जिसका राज्य काफी बड़ा और फैला हुआ था । उसे घमंड था कि वह एक बहुत बड़ा राजा है । एक महात्मा उसके राज्य की सीमा पर आए और अपने शिष्यों के साथ कुछ समय ठहरे । वे एक सिद्ध महात्मा थे जिनकी ख्याति फैली हुई थी । राजा उनसे मिलने भेंट सामग्री लेकर गया । मिलने पर राजा के अहंकार को भांपते महात्मा को देर न लगी क्योंकि राजा ने अपना परिचय यह कह कर दिया कि इस विशाल साम्राज्य का मैं राजा हूँ । महात्मा ने राजा से कहा कि विश्व का नक्शा मंगवाओ और उसमें मुझे तुम्हारा राज्य दिखाओ । राजा ने नक्शा मंगवाया और उसका बड़ा राज्य उसमें एक बिंदु सामान था । तब महात्मा ने कहा कि मेरे जो राजा हैं यानी प्रभु उनका साम्राज्य इस नक्शे जैसे कोटि-कोटि न क्शों में भी नहीं समा सकता । राजा को अपनी गलती महसूस हुई, उसका अहंकार चूर हुआ और वह लज्जित हुआ ।

56. प्रभु के लिए एक नियम

आजकल लोग सेहत को लेकर बहुत जागरूक हैं और प्रायः सुबह पार्क में टहलने जाते हैं । कोई दो किलोमीटर कोई तीन किलोमीटर तक सुबह पैदल चलता है । एक संत एक बहुत सुंदर संशोधन इस क्रम में बताते हैं । वे कहते हैं कि अगर घूमने का उद्देश्य मंदिर कर दिया जाए तो यह पूरा-का-पूरा कर्म भक्ति बन जाता है । अगर हमें तीन किलोमीटर सुबह चलना है तो एक ऐसे मंदिर का चयन करें जो आपके घर से डेढ़ किलोमीटर पर हो । मंदिर चलकर पहुँचे, प्रभु का दर्शन किया और चलकर वापस घर आ गए । इस तरह आपका चलना डेढ़ और डेढ़ मिलाकर तीन किलोमीटर हो गया और सुबह की मंगल बेला में प्रभु के दर्शन भी हो गए जिससे आपका पूरा दिन मंगलमय हो जाएगा । प्रभु इतने दयावान और कृपानिधि हैं कि आपको पांच मिनट के दर्शन का पुण्य नहीं बल्कि आपके घर से चलकर वापस घर आने में जितना समय लगा उतना पुण्य आपके खाते में लिख देते हैं । ऐसा इसलिए क्योंकि दयावान प्रभु यह मान लेते हैं कि आपने पैदल चलकर मंदिर आना और वापस जाना अपने प्रभु के लिए किया जबकि हमारा पैदल चलने का एक उद्देश्य स्वास्थ्य भी था । पर प्रभु उसे अनदेखा कर आने-जाने के पूरे समय का पुण्य आपके खाते में लिख द...

55. प्रभु नाम का प्रभाव

प्रभु नाम में प्रभु की सारी शक्तियां समाई हुई होती है । प्रभु ने अपने अवतार काल में जितनों का उद्धार किया प्रभु का नाम आज तक उससे भी कई गुना ज्यादा लोगों का उद्धार करता आ रहा है । एक प्राचीन कथा है । श्रीराम राज्य की स्थापना हो चुकी थी । श्री काशी नरेश एक बार प्रभु श्री रामजी से मिलने श्री अयोध्याजी पधारे । पहले उन्हें देवर्षि प्रभु श्री नारदजी मिले और उन्हें कहा कि राज्यसभा में सभी को प्रणाम करना पर ऋषि श्री विश्वामित्रजी को अनदेखा कर देना । श्री काशी नरेश ने ऐसा ही किया । ऋषि श्री विश्वामित्रजी रुष्ट हो गए और प्रभु श्री रामजी को शपथ देकर सूर्यास्त तक श्री काशी नरेश का वध करने का वचन ले लिया । श्री काशी नरेश भागे तो फिर देवर्षि प्रभु श्री नारदजी ने उन्हें भगवती अंजना माता की शरण में भेजा । भगवती अंजना माता ने अपने पुत्र प्रभु श्री हनुमानजी से श्री काशी नरेश को बचाने के लिए कहा । प्रभु श्री हनुमानजी प्रभु के नाम की महिमा को भली-भांति जानते थे और वे श्री काशी नरेश को लेकर वापस श्री अयोध्याजी में सरयू माता के पास गए और श्री काशी नरेश को सरयू माता के पावन जल में खड़े होकर लगातार श्रीरा...

54. प्रभु ने लाज निभाई

जब हम प्रभु के प्रति समर्पित होते हैं तो कठिन-से-कठिन बेला में प्रभु हमारे साथ रहते हैं और हमारे मान की रक्षा करते हैं । एक संत एक गांव की कथा सुनाते थे । उस गांव में एक प्राचीन मंदिर था जिसमें दो पुजारी समाज की तरफ से नियुक्त थे । एक पुजारी की बेटी का विवाह तय हुआ पर विवाह सायंकाल   का था और दोपहर की पूजा के बाद पहले वृद्ध पुजारी की तबीयत खराब हो गई । उसने शाम की पूजा और सेवा का भार उस पुजारी पर छोड़ा जिसकी बेटी का विवाह उसी दिन था । वह पुजारी बड़ा भक्त था और प्रभु उसके लिए सर्वदा सर्वप्रथम थे । वह विवाह की परवाह किए बिना और घर में किसी को कुछ बताएं बिना सायंकाल   की पूजा और सेवा के लिए मंदिर में उपस्थित हो गया । सभी सेवा, पूजा और आरती बड़े चाव से की और प्रभु को शयन कराके रात दस बजे घर पहुँचा । उसने सोचा कि घर पर सब नाराज होंगे, उसे बुरा भला कहेंगे पर पत्नी ने बड़े प्रेम से गर्म भोजन परोसा । दूसरे दिन दोपहर की मंदिर की सेवा को विश्राम कर के घर आने पर पत्नी ने उसे शादी की फोटो दिखाई जो फोटोग्राफर घर देकर गया था । शादी की हर फोटो में पुजारीजी ने स्वयं को देखा । फोटो देखते ह...

53. भक्ति के लिए मानव जीवन

प्रभु ने भक्ति करने के लिए मानव जीवन दिया है । भक्ति कर हम अपने मानव जीवन को अंतिम जन्म बना सकते हैं और आवागमन के चक्र से मुक्त हो प्रभु के श्रीकमलचरणों में सदैव के लिए स्थान पा सकते हैं । पर हम मानव जीवन में सबसे जरूरी भक्ति को छोड़कर सब कुछ करते हैं और इस तरह उस जन्म को व्यर्थ कर लेते हैं । एक सेठजी एक संत के शिष्य थे । सेठजी हरदम कहते थे कि सत्संग और भक्ति के लिए वे अपनी दैनिक दिनचर्या में समय नहीं निकाल पाते । एक बार संत उन सेठजी को साथ लेकर सुबह भ्रमण पर गए । रास्ते में गलियों में कुत्ते, गधे, सूअर आदि सब जानवर मिले । संत ने कहा कि ये सब भी किसी जन्म में मानव थे और इनमें से कोई इंजीनियर था, कोई डॉक्टर था, कोई व्यापारी था और आपकी तरह ये भी अप नी दिनचर्या में इतने व्यस्त रहते थे कि प्रभु के लिए समय नहीं निकाल पाए । काल ने इन्हें दंड देते हुए दो पैर से चार पैर वाला बना दिया । अब इनके पास समय-ही-समय है पर ये आवारा घूमते हैं क्योंकि इ नकी योनी में भक्ति और भजन संभव नहीं है।   भक्ति और भजन केवल मानव योनी में ही संभव है और शास्त्रों का आदेश है कि संसार के करोड़ों का मों को छ...

52. स्वर्णिम अवसर

हम भजन और भक्ति को बुढ़ापे के लिए छोड़ देते हैं और बचपन खेल में, जवानी धन कमाने में व्यतीत कर देते हैं और बड़ी चूक कर देते हैं । बुढ़ापे में शरीर भजन के लिए सहयोग नहीं देता, रोगग्रस्त हो जाता है और हम जीवन मुक्त होने का स्वर्णिम अवसर चूक जाते हैं । एक किसान एक पहुँचे हुए संत का शिष्य था । उसे अभिलाषा थी कि वह बहुत धनवान बने । उस की गुरु सेवा से संत अति प्रसन्न थे । किसान ने एक दिन अवसर देखकर अपने धनवान बनने की बात संत को कह दी । संत ने अपने तपोबल से एक साधारण मणि को अभिमंत्रित करके पारस-मणि बना दी और किसान को देते हुए एक हफ्ते का समय दिया । संत ने कहा कि आज सोमवार है, अगले सोमवार सुबह में आऊंगा और मणि ले लूंगा । तब तक जितने लोहे को तुम इस मणि से छुआ दोगे वह स्वर्ण बन जाएगा और तुम धनवान बन जाओगे । किसान ने अपने खेत बेच दिया और प्राप्त रकम से जगह-जगह से लोहा इकट्ठा करने लगा । उसने सोचा कि जितना लोहा इकट्ठा कर सकता हूँ छह दिन में कर लूं फिर एक साथ मणि के द्वारा सबको स्वर्ण बना लूंगा । लोहा इकट्ठा करते-करते लालच के कारण समय का भान नहीं रहा और सातवें दिन संत आ गए । उसने बहुत मिन्नत करी क...

51. प्रभु से मांग

हम प्रभु से क्या मांगते हैं यह महत्वपूर्ण है । साधारण तौर पर लोग प्रभु से संसार के सुख, पुत्र, पौत्र, आरोग्य, धन, संपत्ति मांगते हैं । पर जिसका सत्संग के कारण विवेक जागृत हो गया है वह प्रभु से प्रभु के धाम जाने की मांग करता है और वहाँ प्रभु की सेवा मांगता है । एक राजा का जन्मदिन था इसलिए वह राज्य के कारागार में गया और सभी कैदियों से कहा कि जो चाहे मांग लो । एक कैदी बोला महीने भर के लिए एक साबुन नहाने के लिए मिलती है उसे दो करवा दें । दूसरे कैदी ने कहा कि ठंड में कंबल मोटी और बढ़िया मिल जाए । तीसरे ने कहा कि कारागार की जिस कोठरी में मुझे रखा है वह गं दी है उसका रंग रोगन कर दिया जाए । राजा ने खुशी-खुशी सब करने का आदेश दे दिया । इस तरह सब कैदी अपनी मांग रखते गए और प्रसन्न मुद्रा में राजा सबकी स्वीकृति देता रहा । एक अंतिम कैदी बचा, वह बहुत समझदार था । उसकी बारी आई तो उसने मांगा कि कारागार से मुक्त कर उसे राज दरबार की सेवा में ले लिया जाए । राजा अति प्रसन्न हुआ और उसे मुक्त करके अपने राज दरबार की सेवा में ले लिया । फिर राजा को अन्य कैदियों ने कहा कि हमें भी मुक्त करवा दें । राजा ने कहा क...

50. माया की रस्सी

हम प्रभु की भक्ति क्यों नहीं कर पाते ? क्यों प्रभु के लिए समय नहीं निकाल पाते ? क्योंकि हम संसार के मायाजाल में फंसे हुए हैं । माया ने इस संसार में हमें इस तरह भ्रमित किया है कि हम अपने आपको पूरा फंसा हुआ पाते हैं । हमारे पास संसार करने के बाद प्रभु के लिए समय ही नहीं बचता । एक संत एक कथा सुनाते थे । एक धोबी अपने गधे पर कपड़े लादकर नदी पर कपड़े धोने पहुँचा । वह गधे को बांधने की रस्सी लाना उस दिन भूल गया था । उसने सिर्फ दिखावे के लिए गधे को रोजाना की तरह बांधा । गधा वहीं खड़ा रहा जैसे रोजाना की तरह बंधा हुआ हो । जाने का समय आया तो गधा वहाँ से हिला नहीं । तब धोबी को याद आया कि उसे दिखावे के लिए रस्सी खोलनी पड़ेगी । उसने रस्सी खोलने का नाटक किया तो गधा चल पड़ा । हम भी संसार की खूंटी से इसी तरह दिखावे में बंधे हुए हैं । हम सत्यता में बंधे नहीं हैं पर हमें भान होता है कि हम संसार से बंधे हुए हैं, ठीक उस गधे की तरह । माया ने हमें धोबी की तरह दिखावे में संसार से बांध रखा है ।

49. प्रभु ही करने वाले

प्रभु ही सबका पालन करते हैं । एक धनाढ्य व्यक्ति से लेकर एक चींटी तक का पालन-पोषण प्रभु ही करते हैं । हमें झूठा भ्रम या घमंड नहीं पालना चाहिए कि हमारी वजह से या हमारी कमाई से हमारा परिवार चल रहा है । एक नौकरी करने वाला व्यक्ति था । उसे घमंड था कि वह कमाता है तभी घर चलता है । एक बार पत्नी के साथ बिना मन के सत्संग में गया जहाँ संत कह रहे थे कि सबकी व्यवस्था प्रभु करते हैं । वह व्यक्ति सत्संग के बाद संत से उलझ गया कि मेरे परिवार की व्यवस्था तो मैं स्वयं करता हूँ । पत्नी जब सत्संग के बाद वापस घर चली तो संत ने उस व्यक्ति को रोका और कहा कि एक वर्ष के लिए बिना बताए कहीं चले जाओ और फिर वापस आकर देखना तब पता चलेगा कि सत्य क्या है । वह व्यक्ति बिना किसी को बताए रात को घर से चला गया । दूसरे दिन परिवार वालों ने खोजा तो वह नहीं मिला । फिर प्रभु की प्रेरणा से गांववालों ने उसके बड़े बेटे को एक सेठ के यहाँ नौकरी पर लगा दिया । प्रभु की प्रेरणा से गांववालों ने मिलकर रकम जोड़कर उसकी बेटी का विवाह, जो तय था, उसे अंजाम दिया । एक अन्य जमींदार ने उसके छोटे बेटे की पढ़ाई का खर्चा प्रभु प्रेरणा से उठा लिया ...

48. सत्संग का महत्व

काल भी प्रभु के भक्त का बुरा नहीं कर सकता । काल से संसार डरता है पर प्रभु के भक्त का काल भी आदर करता है । एक संत कथा सुनाते थे कि एक भक्त सत्संग के लिए घर से निकला । रास्ते में एक जगह ठोकर लगी, गिरा और कपड़ो में कीचड़ लग गया । वह दोबारा घर गया और कपड़े बदलकर आया । फिर वहीं पर गिरा और फिर कीचड़ से भरे कपड़े बदलने के लिए घर गया । तीसरी बार जब वहाँ पहुँचा तो एक पुरुष वहाँ पहुँचा और अपनी उंगली प क ड़कर उस व्यक्ति को सत्संग के पंडाल में ले जाकर पहुँचा दिया । भक्त ने उस पुरुष को धन्यवाद दिया और पूछा कि आप कौन हैं ? उस पुरुष ने कहा कि मैं काल हूँ और आपको लेने आया था पर जैसे ही आप सत्संग के लिए निकले प्रभु ने आपके पाप और आपकी मौत को टाल दिया । दूसरी बार आप वापस आए तो प्रभु ने आपके परिवार को पाप मुक्त कर दिया । इसलिए तीसरी बार मैं ने स्वयं आपको सत्संग तक लाकर छोड़ा नहीं तो तीसरी बार अगर आप गिरते और आप फिर सत्संग के लिए घर से कपड़े बदलकर लौटते तो प्रभु इतने दयालु है कि अब तो आपके पूरे गांव को पाप मुक्त कर देते । काल ने कहा कि सत्संग का इतना भारी महत्व है ।

47. प्रभु सर्वसामर्थ्यवान

प्रभु के यहाँ कुछ भी असंभव नहीं है । असंभव शब्द प्रभु के शब्दकोश में है ही नहीं । प्रभु सर्वसामर्थ्यवान हैं और अपने संकल्प मात्र से सब कुछ करने में पूर्ण सक्षम हैं । एक संत एक दृष्टांत देते थे कि जब माता बूढ़ी हो जाती है तो सुई के छिद्र में चश्मा लगा कर बड़ी मुश्किल से धागा डालती है । पर प्रभु अपने संकल्प मात्र से उस सुई के छिद्र से अनंत कोटि ब्रह्मांडों को पार कर सकते हैं । सुनने में यह असंभव लगेगा कि ब्रह्मांड कितने विशाल होते हैं और सुई का छिद्र कितना छोटा होता है पर प्रभु के लिए यह असंभव भी संकल्प मात्र से पूर्णतया संभव हो जाता है । इससे प्रभु के सर्वसामर्थ्यवान होने का हमें भान होता है । ऐसा कुछ भी नहीं, ऐसी कोई असंभव चीज की हम कल्पना भी नहीं कर सकते जो प्रभु मात्र संकल्प से पूर्ण नहीं कर सकते । जो संभव है उसे प्रभु संभव करते हैं, जो असंभव है उसे भी प्रभु संभव करते हैं और जो पूर्णतया और कल्पना में भी असंभव है उसे भी प्रभु संभव करते हैं । इसलिए संत कहते हैं कि असंभव-से-असंभव परिस्थिति में भी प्रभु पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए ।