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Showing posts from September, 2024

64. हमने संसार को पकड़ा

उम्र आने पर भी हम संसार में उलझे रहते हैं और मानव जीवन के उद्देश्य भगवत् प्राप्ति की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता । जब कोई हमें आगाह करता है तो हमारा एक ही उत्तर होता है कि क्या करूं संसार के कामों में इतना व्यस्त हूँ कि प्रभु के लिए समय ही नहीं निकल पाता । एक सेठजी एक संत के शिष्य थे । संत उन्हें बार-बार कहते थे कि अब आपके बेटे काम संभाल चुके हैं और आपकी आयु भी अधिक हो गई है तो अब आपको संसार की दुनियादारी छोड़कर भगवत् प्राप्ति के उद्देश्य से प्रभु की भक्ति करनी चाहिए । जितनी बार भी संत ऐसा सेठजी को समझाते सेठजी एक ही बात कहते थे कि चाहता तो मैं भी हूँ पर संसार मुझे छोड़ता ही नहीं । एक बार संत उनके घर पर एक रात रूके । सुबह जब प्रस्थान का समय आया तो संत एक खंभे को प क ड़कर चिपक गए और कहने लगे कि खंभे ने मुझे पकड़ लिया । सेठजी तुरंत बोल पड़े कि गुरुजी आप खंभे को छोड़ दें तो खं भा भी आपको छोड़ देगा । संत बोले कि यही मैं तुमको बताना चाहता हूँ कि तुम संसार में मत उलझो, संसार को छोड़ दो तो संसार भी तत्काल तुम्हें छोड़ देगा । संत ने आगे कहा कि संसार ने तुमको नहीं पकड़ा   है अपितु जैस...

63. उल्टी रेखाएं

चाहे कोई धनवान हो या गरीब सबको सातों सुख नहीं मिलते । सबके मस्तक पर उल्टी लकीर यानी रेखाएं होती ही हैं । किसी को पुत्र का सुख नहीं, किसी को धन की कमी है, किसी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, किसी को अन्य कोई अशांति रहती है । एक संत एक कथा सुनाते थे । वे कहते थे कि रबर स्टांप   में शब्द और अंक उल्टे होते हैं पर जब वह स्याही में लगाकर कागज पर लगाए जाते हैं तो कागज पर सुलटे हो जाते हैं । वैसे ही जब हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकता है और वहाँ की श्रीरज हमारे मस्तक पर लगकर फिर संसार पटल पर हमारा मस्तक लगता है तो ही वह सुलटा पड़ता है । नहीं तो उल्टी रेखाएं यानी धनहीनता, बीमारी, शोक, रोग, बिगड़े रिश्ते, बच्चों द्वारा परेशानी, व्यापार-नौकरी की दिक्कतें, अन्य अशांति इत्यादि हमें जीवन भर परेशान करके रखती हैं । पर जब साष्टांग दंडवत प्रणाम में हमारा मस्तक प्रभु के श्रीकमलचरणों में झुकता है तो हमारी उल्टी रेखाएं सुलटी हो जाती हैं । प्रभु को किया एक प्रणाम जीवन के कितने बड़े परिणाम को बदलने की क्षमता रखता है ।