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Showing posts from October, 2024

66. आस्तिक और नास्तिक

सत्कर्म, पूजा, सत्संग और भजन कभी व्यर्थ नहीं जाते । वे हमारे पूर्व के संचित पाप काटते हैं और वर्तमान जीवन में हमारा कल्याण और उद्धार कराते हैं । एक संत एक कथा सुनाते थे । दो दोस्त थे । एक बहुत अमीर पर नशा, जुआ, व्यभिचार   और गलत आचरण करने वाला नास्तिक था । दूसरा बहुत गरीब था पर पूजा-पाठ, भजन और सत्संग और श्रीग्रंथों का स्वाध्याय करने वाला आस्तिक था । दोनों एक बार जंगल के रास्ते किसी दूसरे गांव कोई मेला देखने जा रहे थे । गरीब दोस्त को रास्ते में ठोकर लगी और पैर में से रक्त बहने लगा । उससे आगे चल रहे अमीर दोस्त को भी ठोकर लगी पर उसे कुछ नहीं हुआ और उसे लगा कि कुछ जमीन में दबा हुआ है जिसके कारण ठोकर लगी है । उसने खोद कर देखा तो एक स्वर्ण कलश में सोने की मोहरे मिली । वह खुशी-खुशी अपने दोस्त गरीब दोस्त का मजाक उड़ाने आया कि ठोकर दोनों को लगी पर  तुम्हें  खून निकल गया और मुझे बेइंतहा धन मिला । तभी आकाशवाणी हुई कि जि से खून आया है उसकी आज मौत लिखी थी पर सत्संग और भजन के प्रभाव से छोटी-सी चोट में प्रभु ने उसे टाल दिया । और जिसे स्वर्ण मुद्राएं मिली है उसके भाग्य में आज एक राजा...

65. तिलक का महत्व

पहले के लोग तिलक, माला, चोटी रखते थे पर आज पश्चिमी संस्कृति का बोलबाला होने पर यह लुप्तप्राय हो गया है । तिलक को मस्तक पर लगाने का कितना बड़ा महत्व है यह एक प्रसंग से समझने में आता है ।   एक व्यक्ति ने एक दुकानदार से तिलक की डिबिया की एक्सपायरी डेट (समाप्ति तिथि) पू छी । वहीं पास में एक संत बैठे थे वे उठकर आए और एक बड़ा मार्मिक उत्तर उस व्यक्ति को दिया । संत बोले कि तिलक की डिबिया की कोई एक्सपायरी डेट नहीं है पर यह प्रभु की प्रसादी जिनके मस्तक पर तिलक के रूप में लगती है उस मस्तक की एक्सपायरी डेट बढ़ा देती है । इसलिए पहले के वैष्णव सदा घर से निकलने से पूर्व प्रभु का प्रसादी तिलक अपने मस्तक पर धारण करके निकलते थे । जैसे एक पतिव्रता स्त्री की पहचान उसके सिंदूर से होती है कि वह शादीशुदा है ऐसे ही प्रभु के आश्रित एक भक्त की पहचान उसके मस्तक पर प्रभु का प्रसादी तिलक लगाने से होती है ।