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Showing posts from December, 2024

70. प्रभु और माता

जब हम प्रभु के साथ माता का भक्ति से आह्वान करते हैं तो दोनों हम पर अनुग्रह करने पधारते हैं पर केवल माता को धन की लालसा से बुलाने पर वे स्थाई रूप से नहीं रुकती । एक संत विनोद में एक कथा सुनाते थे । एक बार प्रभु श्री नारायणजी को भगवती लक्ष्मी माता ने विनोद में कहा कि कलियुग में लोग केवल मेरी ही कामना करते हैं । प्रभु ने कहा कि मेरी कामना करने वाले भी कुछ बिरले भक्त हैं । ऐसे ही एक भक्त की परीक्षा लेने प्रभु और माता पृथ्वी पर आए । प्रभु एक संत का रूप धारण कर अपने भक्त एक सेठजी के घर पहुँचे । सेठजी ने बड़ा स्वागत सत्कार किया और रात को रुकने का आग्रह किया । तभी माता एक बुढ़िया का रूप धारण करके सेठजी के घर पहुँची । सेठजी ने उनका भी सत्कार किया और दोनों को भोजन परोसा । माता ने अपनी झोली से स्वर्ण की थाली, गिलास और कटोरी निकाल कर कहा कि भोजन वे इ समें ही करती हैं और भोजन के बाद दोबारा उन स्वर्ण के बर्तनों का इस्तेमाल नहीं करती और उसे भोजन करवाने करने वाले को दान दे देती है । उनके पास सिद्धि है और अगले भोजन के समय फिर उनकी झोली में स्वर्ण की थाली, गिलास और कटोरी प्रकट हो जाती है । माता ने कहा...

69. प्रभु द्वारा भक्तों को मान

प्रभु अपने से भी ज्यादा मान अपने भक्तों को देते हैं । प्रभु अपने प्रिय भक्तों को जगत से भी बहुत मान दिलाते हैं । जब प्रभु के भक्तों को मान मिलता है तो सबसे ज्यादा प्रसन्नता प्रभु को ही होती है । श्री रामायणजी का एक प्रसंग है । जब प्रभु श्री रामजी वनवास के लिए वन में गए तो उन्‍होंने सभी ऋषियों और मुनियों के आश्रम जाकर उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया । इसी श्रृंखला में प्रभु मुनि श्री भारद्वाजजी के आश्रम गए । जब प्रभु को मनाने के लिए श्री भरतलालजी वन में गए तो वे भी मुनि श्री भारद्वाजजी के आश्रम पर रुके । मुनि श्री भारद्वाजजी ने जो सबके सामने श्री भरतलालजी को कहा वह भक्त की महिमा बताने वाला उल्लेख था । उन्होंने कहा कि मेरे अभी तक के पुण्य, तपस्या और उपासना का फल था कि प्रभु श्री सीतारामजी मुझे दर्शन देने पधारे । पर प्रभु सीतारामजी के दर्शन का फल है जो एक परम भागवत् भक्त श्री भरतलालजी के दर्शन का सौभाग्य उन्हें आज प्राप्त हो रहा है । यह कितना बड़ा मान एक भक्त के लिए है कि प्रभु की अनुकंपा का फल होता है कि एक भक्त का दर्शन हमें जीवन में मिले । यह कितना बड़ा सच है कि प्रभु अपने से भी कितना ...