प्रभु अपने से भी ज्यादा मान अपने भक्तों को देते हैं । प्रभु अपने प्रिय भक्तों को जगत से भी बहुत मान दिलाते हैं । जब प्रभु के भक्तों को मान मिलता है तो सबसे ज्यादा प्रसन्नता प्रभु को ही होती है ।
श्री रामायणजी का एक
प्रसंग है । जब प्रभु श्री रामजी वनवास के लिए वन में गए तो उन्होंने सभी ऋषियों और
मुनियों के आश्रम जाकर उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया । इसी श्रृंखला में प्रभु
मुनि श्री भारद्वाजजी के आश्रम गए । जब प्रभु को मनाने के लिए श्री भरतलालजी वन
में गए तो वे भी मुनि श्री भारद्वाजजी के आश्रम पर रुके । मुनि श्री भारद्वाजजी ने
जो सबके सामने श्री भरतलालजी को कहा वह भक्त की महिमा बताने वाला उल्लेख था । उन्होंने
कहा कि मेरे अभी तक के पुण्य, तपस्या और उपासना का फल था कि प्रभु श्री सीतारामजी
मुझे दर्शन देने पधारे । पर प्रभु सीतारामजी के दर्शन का फल है जो एक परम भागवत् भक्त
श्री भरतलालजी के दर्शन का सौभाग्य उन्हें आज प्राप्त हो रहा है । यह कितना बड़ा मान
एक भक्त के लिए है कि प्रभु की अनुकंपा का फल होता है कि एक भक्त का दर्शन हमें
जीवन में मिले । यह कितना बड़ा सच है कि प्रभु अपने से भी कितना ज्यादा मान अपने
भक्तों को दिलाते हैं ।