जब हम प्रभु के साथ माता का भक्ति से आह्वान करते हैं तो दोनों हम पर अनुग्रह करने पधारते हैं पर केवल माता को धन की लालसा से बुलाने पर वे स्थाई रूप से नहीं रुकती ।
एक संत विनोद में एक कथा सुनाते थे । एक बार प्रभु श्री नारायणजी को भगवती लक्ष्मी माता ने विनोद में कहा कि कलियुग में लोग केवल मेरी ही कामना करते हैं । प्रभु ने कहा कि मेरी कामना करने वाले भी कुछ बिरले भक्त हैं । ऐसे ही एक भक्त की परीक्षा लेने प्रभु और माता पृथ्वी पर आए । प्रभु एक संत का रूप धारण कर अपने भक्त एक सेठजी के घर पहुँचे । सेठजी ने बड़ा स्वागत सत्कार किया और रात को रुकने का आग्रह किया । तभी माता एक बुढ़िया का रूप धारण करके सेठजी के घर पहुँची । सेठजी ने उनका भी सत्कार किया और दोनों को भोजन परोसा । माता ने अपनी झोली से स्वर्ण की थाली, गिलास और कटोरी निकाल कर कहा कि भोजन वे इसमें ही करती हैं और भोजन के बाद दोबारा उन स्वर्ण के बर्तनों का इस्तेमाल नहीं करती और उसे भोजन करवाने करने वाले को दान दे देती है । उनके पास सिद्धि है और अगले भोजन के समय फिर उनकी झोली में स्वर्ण की थाली, गिलास और कटोरी प्रकट हो जाती है । माता ने कहा कि वह दो-चार दिन रुकना चाहती हैं पर संत जहाँ रुके हुए होते हैं वहाँ नहीं रुकती । सेठजी ने लालच में आकर सोचा कि दो-चार दिन बुढ़िया रहेगी तो सुबह, दोपहर, शाम के भोजन के बाद उन्हें स्वर्ण के बर्तन मिलते रहेंगे तो उन्होंने संत से कहा कि आप अपनी व्यवस्था अन्यत्र कर लें । बुढ़िया के रूप में माता संत के रूप में प्रभु को देखकर मुस्कुराई कि माया ने प्रभु के भक्त को भी डिगा दिया । संत चले गए और सेठजी माता के लिए भोजन लेकर आए तो देखा माता भी अंतर्ध्यान हो गई । रात को सेठजी को सपना आया और पूरी लीला उन्हें स्वप्न में दिखी । माता ने कहा कि प्रभु के बिना वे चिरकाल तक किसी के पास भी नहीं रुकती । आपने प्रभु को भेज दिया तो मैं भी चली गई ।