भक्ति के कारण भगवान से जुड़े होने के कारण सद्गुणों की प्रधानता संतों और भक्तों में पाई जाती है । यह उनके ऊपर प्रभु की कृपा प्रसादी होती है कि उनका स्वभाव ऐसा होता है जो प्रभु को प्रिय लगे । संसारी का स्वभाव ऐसा होता है जो उसके परिवार को भी प्रिय नहीं लगता, प्रभु को लगना तो बहुत दूर की बात है ।
एक संत सरोवर के जल में उतरकर आधे शरीर को जलमग्न करके मंत्र पाठ कर रहे थे । पास ही एक संसारी व्यक्ति सरोवर में नहा रहा था । संत को एक बिच्छू ने हाथों में डंक मारा तो उनका ध्यान गया कि बिच्छू सरोवर के जल में डूब रहा है । वे उसे पकड़कर सरोवर के बाहर छोड़ने का प्रयत्न करने लगे । जैसे ही संत अपने हाथों से बिच्छू को पकड़ते वह डंक मारता और संत के हाथों से छूट जाता । संत फिर उसे पकड़ने की कोशिश करते ताकि वे उसे सरोवर के पानी से निकालकर सुरक्षित भूमि में पहुँचा सके । बिच्छू फिर पकड़ने पर डंक मारता और संत के हाथ से छूट जाता । आखिरकार संत ने दोनों हाथों से बिच्छू को पकड़कर डंक के दर्द की परवाह किए बिना उसे सरोवर से बाहर निकाल दिया । सरोवर में जो व्यक्ति नहा रहा था वह यह पूरा नजारा देख रहा था । उसने संत से प्रश्न किया कि मैंने देखा कि सात बार बिच्छू ने आपको डंक मारा फिर भी आखिरकार अपने हिम्मत नहीं हारी । संत बोले जब बिच्छू अपने डंक मारने का स्वभाव नहीं छोड़ सकता तो मैं एक संत होकर परोपकार का स्वभाव कैसे छोड़ सकता हूँ । संत आगे बोले कि बिच्छू अपने स्वभाव अनुसार कार्य कर रहा था और मैं अपने स्वभाव अनुसार कार्य कर रहा था ।