Skip to main content

72. संत स्वभाव

भक्ति के कारण भगवान से जुड़े होने के कारण सद्गुणों की प्रधानता संतों और भक्तों में पाई जाती है यह उनके ऊपर प्रभु की कृपा प्रसादी होती है कि उनका स्वभाव ऐसा होता है जो प्रभु को प्रिय लगे संसारी का स्वभाव ऐसा होता है जो उसके परिवार को भी प्रिय नहीं लगता, प्रभु को लगना तो बहुत दूर की बात है

एक संत सरोवर के जल में उतरकर आधे शरीर को जलमग्न करके मंत्र पाठ कर रहे थे पास ही एक संसारी व्यक्ति सरोवर में नहा रहा था संत को एक बिच्छू ने हाथों में डंक मारा तो उनका ध्यान गया कि बिच्छू सरोवर के जल में डूब रहा है । वे उसे पकड़कर सरोवर के बाहर छोड़ने का प्रयत्न करने लगे जैसे ही संत अपने हाथों से बिच्छू को पकड़ते वह डंक मारता और संत के हाथों से छूट जाता संत फिर उसे पकड़ने की कोशिश करते ताकि वे उसे सरोवर के पानी से निकालकर सुरक्षित भूमि में पहुँचा सके बिच्छू फिर पकड़ने पर डंक मारता और संत के हाथ से छूट जाता आखिरकार संत ने दोनों हाथों से बिच्छू को पकड़कर डंक के दर्द की परवाह किए बिना उसे सरोवर से बाहर निकाल दिया सरोवर में जो व्यक्ति नहा रहा था वह यह पूरा नजारा देख रहा था उसने संत से प्रश्न किया कि मैंने देखा कि सात बार बिच्छू ने आपको डंक मारा फिर भी आखिरकार अपने हिम्मत नहीं हारी संत बोले जब बिच्छू  अपने डंक मारने का स्वभाव नहीं छोड़ सकता तो मैं एक संत होकर परोपकार का स्वभाव कैसे छोड़ सकता हूँ संत आगे बोले कि बिच्छू अपने स्वभाव अनुसार कार्य कर रहा था और मैं अपने स्वभाव अनुसार कार्य कर रहा था

Popular Posts

01. प्रभु के दो बड़े प्रण

प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में अपने आश्रित का योगक्षेम वहन करने का प्रण लिया है । योगक्षेम दो शब्दों से बना है योग एवं क्षेम । योग का यहाँ अर्थ है कि प्रभु कहते हैं कि उनकी शरण ग्रहण करने वाले को जिस भी चीज की जब भी जरूरत होगी प्रभु उसे उपलब्ध करवाएंगे । क्षेम का अर्थ है कि प्रभु कहते हैं कि उसकी शरण ग्रहण करने वाले के पास जो भी है प्रभु उसकी रक्षा करेंगे । यह दोनों कितने विलक्षण प्रभु के प्रण हैं कि जब भी जिस भी चीज की उसे जरूरत होगी वह प्रभु पहुँचाएंगे और जो उसके पास है प्रभु उसकी रक्षा करेंगे । एक संत एक तीर्थ में रहने वाले पंडितजी की एक सत्य कथा सुनाते थे । एक पंडितजी नियमित रूप से मंदिर में श्रीमद् भगवद् गीताजी का पाठ करते थे और जो भी चढ़ावा आ जाता था उससे अपना घर चलाते थे । एक बार ऐसा हुआ कि तीन दिन तक कोई चढ़ावा नहीं आया और घर का चूल्हा बंद हो गया । उनकी पत्नी जो उनके जैसे श्रद्धावाली नहीं थी वह बिगड़ गई कि आपके प्रभु ऐसा योगक्षेम वहन करते हैं । पंडितजी को भी पत्नी की बात सुनकर उस समय गुस्सा आ गया और वे रात को मंदिर गए और श्रीमद् भगवद् गीताजी में लिखे योगक्षेम शब्द को ...

04. प्रभु की सेवा

हमारे घर के मंदिर में प्रभु का विग्रह होता है और हम उसकी सेवा करते हैं । सेवा करते - करते कभी हमें अपनी सेवा पर अभिमान आ जाए या लगे कि हम कितनी उत्कृष्ट सेवा कर रहे हैं तो प्रभु उस सेवा को स्वीकार नहीं करते । ऐसा नहीं हो इसलिए एक संत एक प्रसंग सुनाते थे । इस प्रसंग को बीच-बीच में पढ़ते रहना चाहिए । यह प्रसंग प्रभु श्री कृष्णजी और भगवती यशोदा माता के संदर्भ में है । श्री नंद बाबा के पास नौ लाख गौ - माताएं थी । इसमें से श्रेष्ठ नस्ल की एक लाख गौ - माताओं को उन्होंने प्रभु के लिए रखा था यानी   उनका दूध अन्य कोई काम   में नहीं लिया जाता था । एक लाख गौ - माताओं का दूध दस हजार गौ - माताओं को पिलाया जाता था । दस हजार गौ - माताओं का दूध एक हजार गौ - माताओं को पिलाया जाता था । एक हजार गौ - माताओं का दूध सौ गौ - माताओं को पिलाया जाता था । सौ गौ - माताओं का दूध दस गौ - माताओं को पिलाया जाता था । दस गौ - माताओं का दूध एक गौ - माता को पिलाया जाता था इन एक गौ - माता को पद्मगंधा गौ - माता कहा जाता था । इन पद्मगंधा गौ - माता का दूध प्रभु को पिलाने के लिए, दही, छाछ, मक्खन के लिए उपयोग में लि...

20. हर जगह प्रभु को साथ रखें

एक आदत बना लें कि जब भी घर से निकलें तो मन में कहें कि प्रभु साथ चलें और मार्गदर्शन करें ताकि मैं कोई गलती न कर बैठूं । घर में रहें तो प्रभु की  मनोमय (मन में बनाई गई प्रभु की प्रतिमा)  प्रतिमा अपने कार्यस्थल में लगा कर रखें और बीच-बीच में कार्य करते-करते प्रभु को देखें और बात करें कि मैं सही कार्य कर रहा हूँ की नहीं । पांडवों ने प्रभु श्री कृष्णजी को सदैव अपने साथ रखा और प्रभु ने पग-पग पर उनकी रक्षा की ।   सौ कौरव मारे गए पर पांचो पांडव प्रभु कृपा से बच गए । भगवती कुंतीजी , जो पांडवों की माता थी , उन्होंने प्रभु का एहसान मानते हुए सारे प्रसंग गिनाए जब प्रभु ने साक्षात रूप से पांडवों के प्राणों की रक्षा की । इतना बड़ा युद्ध , अपने से विशाल सेना और अनेक महारथियों के होने के बाद भी प्रभु के कारण पांडवों को विजयश्री मिली , वो भी प्रभु के बिना शस्त्र उठाए । पर पांडव एक जगह प्रभु को बिना लिए और प्रभु को बिना पूछे गए और फंस गए । यह प्रसंग था जुए के न्‍योते का जो उनके ताऊजी धृतराष्ट्र ने भिजवाया था । अगर वे प्रभु से पूछते तो प्रभु मना कर देते कि नहीं जाना है । अगर पांडव दुह...