प्रभु ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में अपने श्रीवचन में साफ-साफ कहा है कि जो कर्म हमने किया नहीं उसका फल हमें भोगना पड़ेगा नहीं और जो कर्म हमने किए हैं उसके फल हमें निश्चित भोगने पड़ेंगे । इसलिए संतों ने कहा है कि कोई इस जन्म में हमें दुःख दे रहा है तो वह मात्र वे दुःख पहुँचा रहा है जो हमारे पूर्व कर्मों ने तैयार किए हैं ।
एक संत एक कथा सुनाते थे । एक व्यक्ति एक फल की दुकान में गया और सभी सड़े गले फलों का सौदा किया, कीमत अदा की और फलवाले के पास ही स्थित उसके घर में पहुँचाने के लिए कहा । फलवाले ने कुछ समय बाद अपने कर्मचारी के साथ सड़े गले फल उस व्यक्ति के दिए पत्ते पर उसके घर पर भिजवा दिए । जैसे ही सड़े गले फल पहुँचे वह व्यक्ति फलवाले के कर्मचारी से झगड़ने लगा कि इतने सड़े गले फल लाए हो । कर्मचारी ने जवाब दिया कि फल का चयन अपने ही किया था, मेरा कार्य तो आपके चयन किए फल को लाकर आपको देना है । मेरा कोई दोष नहीं । ऐसे ही हमने पूर्व जन्मों में पाप कर्म किए, उसका जो विपरीत फल है उसे कोई रिश्तेदार, मित्र, संबंधी हमें इस जन्म में दुःख के रूप में लाकर देता है । वह माध्यम बनता है ठीक उस फलवाले के कर्मचारी के रूप में पहुँचाने हेतु । पर हम दुःख देने के लिए उसे दोष देते हैं जो कि गलत है । पूर्व जन्मों में पाप कर्म करके दुःख की फसल हमने इस जन्म के लिए तैयार की । अब उसे पहुँचाने का माध्यम कोई भी बन सकता है । इसलिए इस जन्म में पाप कर्म से बचना चाहिए जो इस जन्म में या अगले जन्म में दुःख का निर्माण करें ।